Skip to main content

Posts

Showing posts from July, 2012

चांद और कवि / रामधारी सिंह "दिनकर"

चांद और कवि / रामधारी सिंह "दिनकर" रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,   आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!   उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,   और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है।   जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?   मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;   और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी   चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते।   आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का; आज उठता और कल फिर फूट जाता है; किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?   बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है।   मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,   देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?